Mira Bai Biography in Hindi – मीरा बाई की जीवनी हिंदी में

मीरा बाई की जीवनी (Biography of Mira Bai in Hindi):- आज के समय मे हम में से सभी लोग मीरा बाई के बारे में तो जरूर से जानते है। इन्होंने अपना पूरा जीवन साधु संतों के साथ में बिताया था और आजीवन भगवान कृष्ण की भगति करने में लग गई थी। वर्तमान समय मे मीरा बाई को भगवान श्री कृष्ण की सबसे बड़ी भक्त के रूप में जाना जाता है। आज हम आपको मीरा बाई की जीवनी (Biography of Mira Bai in Hindi) के बारे में ही बताने वाले है।

मीरा बाई का जीवन परिचय हिंदी में – Mira Bai Biography in Hindi

मीरा बाई की जीवनी हिंदी में – Mira Bai Biography in Hindi

मीरा बाई का प्रारंभिक जीवन :-

हमे अभी तक कोई भी ऐसा विश्वशनीय प्राचीन काल का कोई दस्तावेज नही मिला है जो कि मीरा बाई के जन्म व जन्म स्थान के बारे में जानकारी बताता हो। लेकिन कुछ विद्वानों कई साहित्यों व ग्रन्थों के मदद हम सभी लोगो को मीरा बाई के जीवन के बारे में जानकारी देते है। बहुत सारे विद्वानों व प्रसिद्ध लोगो का ये मानना है कि मीरा बाई का जन्म सन 1498 में राजस्थान राज्य के मेड़ता शहर में हुआ था और इनका खान दान एक राज परिवार था।

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मीरा बाई के पिता का नाम रत्न सिंह राठौड़ था, जो कि एक छोटी सी राजपूत रियासत के शासक थे। मीरा बाई अपने माता पिता की इकलौती सन्तान थी। बचपन के समय मे ही मीरा बाई की माता की मृत्यु हो गई थी। जिसके बाद में इसका पालन पोषण इसके पिता ने ही किया था। मीरा बाई के पिताजी भगवान विष्णु जी के बहुत बड़े भगत थे और इन्होंने ने भी मीरा बाई का पालन पोषण करने का कार्य किया था।

इन सब अलावा मीरा बाई के दादाजी के बहुत अच्छे योद्धा भी थे और इनके घर पर हमेशा बहुत सारे साधु संतों का आना जाना रहता था। जिसके कारण बचपन के समय से मीरा बाई का सम्पर्क साधु संतों और धार्मिक लोगो से होने लग गया था जिससे वो भी एक बहुत बड़ी और प्रसिद्ध भगत बन गई थी। कुछ विद्वानों व स्रोतों के अनुसार मीरा बाई बहुत दिनों तक साधु संतों के साथ रहने लगी थी, जिसके बाद में मीरा बाई द्वारिका नगरी में चली गईं थी। और मीरा बाई द्वारिका में सन 1560 में एक भगवान कृष्ण की मूर्ति के सामने समा गई थी।

मीरा बाई की शादी :-

कुछ स्रोतों के अनुसार मीरा बाई की शादी सन 1516 में राणा सांगा के पुत्र व मेवाड़ राज्य के राजकुमार राजा भोज राज के साथ मे हुई थी। इनकी शादी के कुछ सालों के बाद में सन 1518 में राजा भोज राज का दिल्ली के सल्तनत शासको के बीच मे संघर्ष हुआ था जिसमे मीरा बाई के पति घायल हो गए थे जिसके कारण सन 1521 में मीरा के पति राजा भोज राज की मृत्यु हो गई थी।

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राजा भोज राज की मृत्यु के कुछ समय बाद ही मीरा बाई के पिता व राजा भोज के पिता का बाबर (मुगल साम्रज्य का संस्थापक) के साथ मे हुआ जिसमें इन दोनों की भी मृत्यु हो गई थी। कुछ स्रोतों के अनुसार हमे ये जानकारी भी मिलती है कि मीरा बाई के पति की मृत्यु के समय मे सती प्रथा प्रचलति थी, जिसके तहत मीरा बाई को उनके पति के साथ जलाने के लिए कहा गया परन्तु मीरा बाई इसको स्वीकार नही किया था। और इसके कुछ समय के बाद में मीरा बाई साधु संतों के साथ मे रहने लग गई थी और भगवान कृष्ण की भगति में लग गई थी।

मीरा बाई की कृष्ण भक्ति :-

मीरा बाई अपने पति की मृत्यु के बाद में ही साधु संतों के साथ में रहने लगे गई थी और दिनों दिन इनके मन व ह्रदय में भगवान कृष्ण के प्रति भक्ति बढ़ती गई थी। मीरा बाई अपने जीवन मे हमेशा भगवान कृष्ण के मंदिर में जाती थी और भगवान कृष्ण के भक्तो व भगवान कृष्ण जी की मूर्ति के सामने नाचती थी। ऐसे भगवान कृष्ण की मूर्ति व उनके भक्तो के सामने नाच गाना करके कृष्ण की भक्ति करते रहना मीरा बाई के पति के परिवार को बिल्कुल भी अच्छा नही लगता था। इसलिए बहुत बार मीरा बाई के पति के परिवार वालो ने बहुत बार मीरा बाई को जहर देकर मारने की भी कोशिश की थी।

कुछ विद्वानों व स्रोतों के अनुसार मीरा बाई ने लगभग सन 1533 के आसपास में चितौड़ को छोड़ दिया था क्योंकि ‘राव बीरमदेव’ ने मीरा बाई को मेड़ता शहर में बुला लिया था। मीरा बाई के चितौड़ छोड़ने के एक साल बाद ही सन 1534 में बहादुरशाह जफर ने चितौड़ पर हमला कर दिया और उसे अपने कब्जे में ले लिया था।

इस हमले में चितौड़ के शासक विक्रमादित्य की मृत्यु हो गई थी और इसके साथ साथ सैकड़ों महिलाओं ने भी जल व अग्नि आदि से जौहर कर लिया था। इसके चार साल बाद ही सन 1538 में जोधपुर के शासक राव मालदेव ने चितौड़ पर आक्रमण कर दिया और उसे अपने कब्जे में ले लिया था। इसके बाद में चितौड़ के शासक बीरमदेव ने चितौड़ से भागकर अजमेर के शासक के पास में शरण ले ली थी।

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इसी समय मीरा बाई पूरी तरह से भगवान कृष्ण की भक्ति में लग गई थी और मीरा बाई ब्रज की तीर्थ यात्रा पर चली गई थी। इसके कुछ समय बाद में मीरा बाई सन्‌ 1539 में वृंदावन में गोस्वामी से मिलीं था और यही वृंदावन में कुछ सालो तक मीरा बाई निवास करने लग गई थी। फिर सन 1546 में मीरा बाई वृन्दावन को छोड करके द्वारका शहर में चली गईं थी।

तत्कालीन समय में समाज लोगो द्वारा मीरा बाई को एक विद्रोही घोषित कर दिया गया था क्योंकि मीरा बाई के धार्मिक क्रिया-कलाप किसी भी राजकुमारी और विधवा महिला के लिए तय किए गए परंपरागत नियमों से बिल्कुल ही अलग थे। मीरा बाई अपने जीवन का अधिकांश समय भगवान कृष्ण के मंदिर व साधु संतों के साथ में ही बिताती थी और बहुत सारे नए नए साधु संतों से मिलना, अलग अलग तीर्थ यात्रियों से मिलना व भक्ति के पदों की रचना करने का कार्य करती थी। मीरा बाई ने अपने जीवन मे निम्नलिखित भक्ति ग्रंथो की रचना की थी।

मीरा बाई के द्वारा रचित ग्रंथ :-

मीरा बाई ने अपने ने साधु संतों व धार्मिक लोगो के साथ मे जीवन यापन करते समय निम्नलिखित प्रमुख चार ग्रंथों की रचना की थी।

  • बरसी का मायरा
  • गीत गोविंद टीका
  • राग गोविंद
  • राग सोरठ के पद

इन चार प्रमुख ग्रंथो के अलावा भी मीरा बाई ने अपने सभी प्रसिद्ध गीतों को एक ग्रंथ के रूप में लिखे थे जिसे मीरा बाई ने “मीरा बाई की पदावली” नाम दिया है।

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