Aurobindo Ghosh Biography in Hindi – अरविंद घोष की जीवनी

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अरविंद घोष की जीवनी (Biography of Aurobindo Ghosh in Hindi):- आज के समय मे हर कोई अरविंद घोष के बारे में जरूर जानते है, क्योंकि ये एक भारतीय भी है, और बहुत बड़े प्रसिद्ध क्रन्तिकारी है। अरविंद घोष जी ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अपनी बहुत ही अच्छी भूमिका निभाई थी और इन्होंने बहुत सारे आंदोलनों में भी भाग लिया था।

आज हम आपको अरविंद घोष की जीवनी (Biography of Aurobindo Ghose in Hindi) के बारे में ही बताने वाले है।

अरविंद घोष का जीवन परिचय हिंदी में – Aurobindo Ghosh Biography in Hindi

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Aurobindo Ghosh Biography in Hindi – अरविंद घोष का जीवन परिचय हिंदी में

अरविंद घोष का प्रारंभिक जीवन :-

भारत के प्रसिद्ध क्रांतिकारी अरविंद घोष का जन्म सन 15 अगस्त 1872 को बंगाल राज्य के कोलकाता (भारत) शहर में हुआ था। इनका पूरा नाम अरविंद कृष्णघन घोष है और इनके पिता का नाम कृष्ण धुन घोष व इनकी माँ का नाम स्वर्ण लता देवी था। अरविंद घोष जी ने सन 1901 में भूपाल चन्द्र बोस की लड़की मृणालिनी के साथ शादी की थी और अंत में दिसंबर 1918 में इन्फ्लुएंजा के एक संक्रमण रोग से मृणालिनी देवी की मृत्यु हो गयी थी

अरविंद घोष के पिता बंगाल के रंगपुर शहर में एक सहायक के रूप में सर्जन थे, और उनको अंग्रेजी संस्कृति बहुत ही ज्यादा प्रभावित करती थी। इसलिए अरविंद घोष के पिताजी ने अपने बच्चों को अंग्रेजी शिक्षा देने का निश्चय किया और उन्हें अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ने के लिए भेज दिया था। अरविन्द कृष्ण लाल घोष की मृत्यु 5 दिसंबर 1950 को हो गई थी।

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क्योंकि इनके पिताजी अपने बच्चों को अंग्रेजी व ख्रिश्चन धर्मं की संस्कृति के बारे में सब जानकारी देना चाहते थे, इसलिए इन्होंने ने अरविंद घोष व उनके भाइयो को पढ़ने के लिए दार्जिलिंग के लोरेटो हाउस बोर्डिंग स्कूल में भेज दिया गया था। यह अंग्रेजी शिक्षा व सभ्यता के बारे में जानकारी पाने का मुंख्य केंद्र था।

अरविंद घोष की शिक्षा (Education of Aurbindo Ghosh):-

अरविंद घोष के पिताजी ने अरविन्द घोष जी को मात्र सात वर्ष की उर्म में ही पढ़ाई करने के लिए इंग्लैंड भेज दिया था, यहाँ इन्होंने लगभग 14 साल तक पढ़ाई की थी। अरविंद घोष ने अपनी स्कूली शिक्षा सैंट पौल्स स्कूल (1884) इंग्लैंड से प्राप्त की थी और यहाँ से उन्हें छात्रवृत्ति मिली जिसके बाद में इन्होंने कैम्ब्रिज के किंग्स कॉलेज (1890) इंग्लैंड में अपनी आगे की पढ़ाई पूरी की थी।

अरविंद घोष पढाई में बहुत ही ज्यादा चतुर और बुद्धिमान थे और इन्होंने भारतीय सनदी सेवा की परीक्षा में भी काफी अच्छे अंकों से उत्तीर्ण कर ली थी।

सन 1893 में अरविंद घोष को बड़ोदा के गायकवाड में एक नौकरी मिल गयी थी इसलिए वह इंग्लैंड से वापस भारत वापस आ गए थे। इनको और दूसरे देशों की भाषा व संस्कृति के बारे में बहुत जानकारी थी परंतु उनको भारतीय संस्कृति व सभ्यता के बारे मे बहुत ही कम जानकारी थी।

अरविंद घोष ने 1893 से 12 साल तक लगातार बड़ोदा में एक शिक्षक की नौकरी की थी और आगे चलकर वह गायकवाड़ महाराजा स्कूल के सचिव भी बन गए थे। इसके बाद में इन्होंने ने बड़ोदा के एक कॉलेज में एक बाईस प्रिंसिपल पद के रूप में भी कार्य किया था। ऐसा करने से उन्हें भारतीय संस्कृति व सभ्यता के बारे में बहुत सारी जानकारी प्राप्त हो गई थी।

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12 साल लगातार भारत में काम करने व रहने के बाद में अरविंद कृष्णलाल घोष को पता चला था की अंग्रेजों ने किस प्रकार से भारतीय संस्कृति व सभ्यता को हानि पहुँचाई है। इसके बारे में पता चलने के बाद से ही अरविंद घोष की रुचि धीरे धीरे राजनीति को और बढ़ने लगी थी।

अरविंद घोष की भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका :-

जैसे ही सन 1905 मे बंगाल में अंग्रेजों के अधिकारी ने व्हाईसरॉय लॉर्ड कर्झन ने बंगाल का विभाजन किया। वैसे ही पूरे भारत देश मे लोगो ने इसके विरोध में बहुत सारे आंदोलन करने शुरू कर दिए थे। इन सब के बीच मे अरविंद घोष ने भी बंगाल विभाजन के विरोध बहुत सारे आंदोलनों के नेतृत्व किया है और यही से यह एक क्रांतिकारी के रूप में जाने जाने लगे थे।

जैसे ही सन 1905 में बंगाल का विभाजन हुआ था उसके तुरंत बाद सन 1906 में अरविंद घोष कोलकाता में पहुंच गए थे। अरविंद घोष बाहर से के एक शान्त व अहंकारी क्रान्तिरकारी के रूप में अंग्रेजी सरकार का विरोध करते थे परंतु अंदर से वो एक क्रांतिकारी संघ टन के साथ मे जुड़े हुए थे और उसके लिए काम किया करते थे।

अरविंद घोष ने बाधा जतिन, जतिन बनर्जी और सुरेन्द्रनाथ टैगोर जैसे बहुत सारे नए क्रन्तिकारियो को प्रेरित किया था और इसके साथ इन्होंने बहुत सारे बंगाल के क्रन्तिकारियो के साथ मे मिलकर भी काम किया था। अरविंद घोष ने अनुशीलन समिति जैसी बहुत सारी अलग अलग प्रकार की समितियों की स्थापना की थी।

इसके बाद में अरविंद घोष ने 1906 में ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन से जुड़ गए थे। उस समय इस अधिवेशन के अध्यक्ष दादा भाई नौरोजी थे। अरविंद घोष ने इस आंदोलन व अधिवेशन में स्वराज, स्वदेश, बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा आदि की पूर्ति करने का काम किया था।

इसके बाद में अरविंद घोष जी ने सन 1907 में भारत मे एक ‘वन्दे मातरम’ नाम अखबार की भी शुरुआत की थी। इस अखबार में अरविंद घोष अंग्रेजी सरकार के द्वारा किये जाने वाले अन्यायों के बारे में लिखते है। ये अखबार पूरी तरह से ब्रिटिश सरकार के खिलाफ था जिसके कारण से उन्हें जेल भी जाना पड़ा था परंतु यहाँ से इन्हें छुड़ा लिया गया था।

इसके पश्चात सन 1907 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस दो अलग अलग गुटों में बंट गया था, मध्यम और चरमपंथी। अरविंद घोष बाल गंगाधर तिलक का समर्थन करते थे। जिसके कारण वे चरमपंथी गुट में शामिल हो गए थे। अरविन्द घोष ने पुणे, बड़ोदा बॉम्बे आदि जगह पर गए थे जहाँ पर उन्होंने बहुत सारे राष्ट्रीय आंदोलनों में हिस्सा लिया था।

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इन सब के बाद में सन 1908 मे खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी लोगो ने मिलकर किंग्जफोर्ड के जुलमी जज को मारने का प्लान बनाया था, जिसके कारण खुदीराम बोस को पुलिस ने पकड़ लिया और फासी दे दी। फिर पुलिस प्रशासन ने एक एक करके अनुशीलन समिती के सभी सदस्यों को पकड़ना लग गए थे।

इसके पश्चात अरविंद घोष को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और फिर उन्हें एक साल तक अलीपुर के कारावास में रखा गया था और फिर उन्हें छोड़ दिया गया। फिर धीरे धीरे इन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलनो में भाग लेना बाद कर दिया और अध्यात्म को धारण करने की और जाने लगे थे।

अरविंद घोष अध्यात्म धारण करने में बाद :-

स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई को बीच मे छोड़ने के बाद में अरविंद घोष ने अप्रैल 1910 अपने जीवनी एक नई शुरुआत की और वह पांडिचेरी शहर में चले गए थे। यहाँ पर इन्होंने एक ‘योगाश्रम’ निकाला था। इस आश्रम की किर्तीया लगभग पुरी दुनिया मे ही फैली थी। फिर 1914 से 1921 के बीच मे अरविंद घोष ने ‘आर्य’ नाम का एक आध्यात्मिक मासिक भी चलाया। इसका मुख्य उद्देश्य मानवी विकास करना व मानवी जीवन को और अधिक सुन्दर बनाना था।

इस आध्यात्मिकता पर अरविंद घोष जी को पूरा भरोसा था, जिसके पश्चात इन्होंने सन 1926 में अपने आध्यात्मिक के व्यक्तियों सह कर्मियों, मिर्जा अल्फस्सा(माता) आदि सब के सहयोग व मदद से श्री औरोबिन्दो आश्रम नामक की स्थापना की थी।

अरविन्द घोष को मिले पुरस्कार –

अरविंद घोष जी ने बहुत सारी कविता, अध्यात्म और तत्त्वज्ञान जिसके लिए उन्हें नोबेल का साहित्य पुरस्कार (1943) और नोबेल का शांति पुरस्कार (1950) से समा नित किया गया था।

अरविंद घोष द्वारा रची गई कृति या :-

द मदर, लेटर्स ऑन योगा, सावित्रीज़, योग समन्वय, दिव्य, जीवन, फ्यूचर पोयट्री, योगिक साधन, “वंदे मातरम”, दिव्य जीवन, श्री अरविन्द अपने विषय में, माता, भारतीय संस्कृति के आधार, वेद-रहस्य, केन एवं अन्यान्य उपनिषद्, ईशोपनिषद और गीता-प्रबंध आदि कृतियां।

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